Saturday, 9 January 2021

वोडाफ़ोन-आयडिया की ख़ुली लूट पर ख़ुला प्रस्ताव

 प्रति,

वोडाफ़ोन-आयडिया, 

देहली सर्किल ऑफ़िस: ए-19, मोहन को-ऑपरेटिव इंडस्ट्रियल ऐस्टेट, मथुरा रोड, नई दिल्ली-110044

रजि. ऑफ़िस: सुमन टावर, प्लॉट नं. 18, सेक्टर-11, गांधीनगर-382 011, गुजरात



वोडाफ़ोन-आयडिया द्वारा मेरे कनेक्शन्स् मोबाइल नंबर 0000000001 व 0000000002 पर स्पष्ट धोखाधड़ी


एयरटेल से परेशान होकर मैंने अपना एक मोबाइल नंबर 0000000001 इसलिए पोर्ट कराया था कि वोडाफ़ोन ने अपनी साइट पर कुछ दावे कर रखे थे. लड़का घर आया, योजना बताई, अपने मोबाइल से फ़ोटो लिया, सिम दी और चला गया. योजना यानि प्लान था 399 रु. + जी एस टी 71.82 रु =470.82 रु महीना. एयरटेल में उस समय मेरे पास 499(+जीएसटी) का प्लान था और मैं अपने बजट के अनकूल और सस्ता चाहता था.

बहरहाल कुछ महीने तक मामला बिलकुल ठीक चला-हर माह 470.82रु का बिल आता और मैं भुगतान कर देता. मैं इंटरनेट के अलावा कुछ इस्तेमाल न करता और मुझे लगा कि वोडाफ़ोन अच्छी फ़ोन कंपनी है.

मैंने ईमेल किया कि 100-150 रु महीने का कोई प्लान हो तो मैं दूसरा नंबर भी पोर्ट करा लूंगा(इंमेल का स्क्रीनशॉट संलग्न है). इस दौरान दो बिल 500 रु के आस-पास आए, मैंने सोचा कि कुछ लेटफ़ीस वगैरह होगी, मैंने वो भी जमा कर दिए.

इस बीच वोडाफ़ोन (जोकि अब वोडाफ़ोन-आयडिया हो चुका था) से एक लड़की का फ़ोन आया कि फ़ैमिली-प्लान के अंर्तगत 199रु का प्लान उपलब्ध है. 0000000001 के साथ ही 0000000002 को जोड़ दिया जाएगा और बिल एक साथ ही आएगा 399+199=598+जीएसटी. उस लड़की ने अपने किसी सीनियर से भी बात कराई और उसने भी बताया कि लड़का आएगा और कागज़ात देखने के बाद 300रु आपसे लेगा जिसमें से 250रु आपके पहले बिल में समायोजित कर दिए जाएंगे. मैंने कहा कि ठीक है, लड़का भेज देना.

लड़का आया. मैंने पूछा कि कोई आई.कार्ड वगैरह है ! उसने दिखाया. उसने मेरे वाई फ़ाई का पासवर्ड मांगा जिससे कि वो पोर्ट करने संबंधी कार्यवाही कर सके. मैंने मना कर दिया. क़ाग़ज़ात देखकर उसने मेरी दीवार के साथ मुझे खड़ा करके मेरी फ़ोटो ली और तीन सौ रु मांगे. मैंने कई बार रसीद मांगी पर उसने हर बार कोई बहाना बना दिया. मैंने कंपनी के अब तक के अच्छे बर्ताव को देखते हुए पैसे दे दिए. उसके कहे अनुसार तीन दिन में मेरा यह नंबर भी चालू हो गया.

उसीके बाद गड़बड़ ख़ुलेआम शुरु हो गई. 0000000001 का अगला बिल 1000 रु से भी ज़्यादा था. 399 के प्लान का बिल 1000रु !! मैंने ईमेल किया कि मैं यह बिल हरगिज़ नहीं दूंगा. आप मेरा फ़ोन अभी काट दीजिए (इंमेल का स्क्रीनशॉट संलग्न है). काटना तो दूर इन्होंने कोई जवाब तक नहीं दिया. मैंने 472रु फिर भी भेज दिए.

इसके बाद दूसरी धोखाधड़ी सामने आई. 199रु का जो दूसरा प्लान मैंने 0000000002 पर लिया था उसका बिल अलग से आया. इस नंबर पर भी इन्होंने 399रु का एक और प्लान शुरु कर दिया था. वायदे के खि़लाफ़ 250रु भी नहीं ऐडजस्ट किए थे. पहले बनाए गए विश्वास के बाद इस क़दर धोखाधड़ी देखकर मैं हैरान हो गया !

0000000002 पर भी मैंने क़रीब 500-500 के तीन बिल दिए हांलांकि हर माह यह लगभग आधे महीने कंपनी इस कनैक्शन को बंद कर देती थी. पर चूंकि मैंने सुना था कि तीन महीने से पहले नंबर पोर्ट नहीं होता इसलिए मैं 3 महीने यह ज़्यादती भी बर्दाश्त करता रहा.

0000000001 का अगला बिल तक़रीबन 2000रु का था. इनके हौसले बढ़ते जा रहे थे. अब मुझे पैसे के लिए फ़ोन आने लगे. शुरु में किन्हीं फ़िरोज़ चौधरी का फ़ोन आया. मैंने सारा केस बताया तो श्री चौधरी ने एक बात यह भी कही कि ‘हां हां हम आपको आरक्षण देंगे'. बिना किसी संदर्भ-प्रसंग के कही गई इस बात पर मैं बिलकुल हैरान हो गया.

शुरु-शुरु में इन्होने माफियां भी मांगी और पैसे कम करने का आश्वासन भी दिया. एकाध ईमेल मेरे पास उस तरह का भी उपलब्ध है. विभिन्न तरह के लोगों के विभिन्न तरह के फ़ोन आने लगे. एक बार इन्होने 6-700रु कम करने का तो एक बार 1000रु कम करने का प्रस्ताव रखा. कभी कोई बात करता तो कभी कोई. कई बार ये लोग फ़ोन उठाते ही उल्टे-सीधे इल्ज़ाम लगाना शुरु कर देते हैं जैसे मुझे उकसाना चाहते हों.

मैं इस कंपनी से कुछ बातें पूछना चाहता हूं-

1. अगर मुझे 1000रु खर्च करने थे तो मैंने 399रु का प्लान क्यों लिया ?

2. पहले 10-12 महीने 470-472रु का बिल आता रहा तो अचानक 1000 रु का कैसे आने लगा ?

3. अगर 399रु के प्लान में अचानक 1000रु का बिल आ जाता है तो आपने प्लान बनाए किसलिए ? इनसे फ़ायदा क्या है ? ऐसे अगर 1 लाख का बिल आ जाएगा तो आप क्या करेंगे और कंज़्यूमर क्या करेगा ?

4. अगर आपके पास इकाई नापने की कोई तक़नीक़ ही उपलब्ध नहीं है तो आपके द्वारा कईयों को चूना लगाया जा रहा होगा.

5. मेरे पहले ईमेल पर आपने कनेक्शन क्यों नहीं काटा ?

6. आप 0000000002 वाला केस छुपा क्यों रहें हैं ?

7. आपने कई बार माफ़ी क्यों मांगी ?

8. आपने कई बार छूट की पेशकश क्यों की(स्क्रीनशॉट संलग्न है) ?

9. श्री फ़िरोज़ चौधरी ने यह क्यों कहा कि-‘‘हां-हां, हम आपको आरक्षण देंगे’ ?

10.   आपके यहां हिंदी में पत्र-व्यवहार की सुविधा क्यों नहीं है ? क्या आपके सारे ग्राहक सिर्फ़ अंग्रेज़ी जानते हैं ?


 

मैंने सिर्फ़ एक महीने का पेमेंट रोका है. अगर यह मेरे कहे अनुसार सही वक़्त पर फ़ोन काट देते तो यह भी नहीं होता.

अब मैं बताऊं जो मैंने इनसे लेना है-

0000000002 वाले कनेक्शन पर वादा किए गए                                                   250 रु

0000000002 पर 199रु की बजाए 399रु का कनेक्शन देने पर 200रु X 3 माह = 600 रु                                                 

इसी नंबर पर 3 माह की जीएसटी (71.82-35.82=36 X 3=)                                108 रु

0000000002 पर 3 महीने में हर बार लगभग आधे माह सर्विस(100 X 3=)           300रु.

इस तरह ये लोग मेरे लगभग 1258 रु के देनदार हैं जबकि मैंने इनके 472/ देने हैं वो भी इनकी ग़लती की वजह से कि मेरे कहने पर इन्होंने फ़ोन नहीं काटे.

472रु कम करके मेरे 786 रु निकलते हैं.

मैं एक और दिलचस्प तथ्य आपके ध्यान में लाना चाहता हूं कि मेरे दो फ़ोन बंद होने की दशा में तीसरे प्रीपेड कनैक्शन पर इसी कंपनी का 299 रु का रीचार्ज कर रहा हूं जिसमें 28 दिन में प्रतिदिन 4 जीबी मिलते हैं. उससे मेरा वही सारा काम हो जाता है जिसके लिए इस कंपनी ने मुझे 472 रु के दो कनैक्शन पेलने चाहे.

इस कंपनी में यदि कोई ज़िम्मदार आदमी है तो मेरी उससे अपील है कि मेरे 786 रु तुरंत या तो किसी विश्वसनीय संस्था की उपस्थिति में दिलवाए जाएं.  वोडाफ़ोन-आयडिया मुझे सर्टिफ़िकेट जारी करे कि हमारा हिसाब हो गया है और अब इन दोनों फ़ोन नंबरों से भविष्य में हमारा कोई संबंध न होगा.

किसी विश्वसनीय की उपस्थिति के बिना मै यह पेमेंट नहीं लूंगा क्योंकि यह कंपनी और इसका स्टाफ़ मेरी नज़रों मे अपनी साख तक़रीबन खो चुके हैं.

अगर यह केस किसी भी सूरत में कोर्ट में जाता है तो कोर्ट से मेरा निवेदन है कि कोर्ट में मैं एक ही सूरत में आ पाऊंगा जब मेरे केस के सही होने की दशा में कोर्ट  मुझे एक करोड़ रुपये या तो वोडाफोन-आयडिया से दिलवाएगा या ख़ुद भुगतान करेगा. कोर्ट से यह मैं लिखित में चाहूंगा. मैं यह भी चाहूंगा कि यह मामला ख़ुली जगह पर चले जहां से कोई भी मीडिया, व्यक्ति और संस्थायें इसे देख सकें और निर्णय ले सकें कि कौन सच्चा है और कौन झूठा!
 

 माफ़ कीजिएगा,  मेरी ज़िदगी इसलिए नहीं है कि हर वक़्त बेईमानों के ठिकानों पर चक्कर काटता रहूं. 

ऐसा करके कोर्ट ग़रीबों और न्यायप्रेमियों के लिए भी एक नज़ीर पेश करेगा. वे देखेंगे कि बेईमानों द्वारा किए जानेवाले झूठे मुकदमों की संख्या में कमी आ गई है.

मेरे हुए अन्य खर्चे और मानसिक प्रताड़ना की क़ीमत भी इस में जुड़ जाएगी अगर निकट भविष्य में मुझे इस कंपनी के खि़लाफ केस करना पड़ा.


धन्यवाद,


-संजय ग्रोवर

फ़ोन नं.: 0000000003

(सुरक्षा व अन्य कारणों से कुछ नंबर अभी छुपा लिए गए हैं)

ऐसे ही एक अन्य केस के बारे में यहां पढ़ें-

https://samwaadghar.blogspot.com/p/blog-page_1006.html

Monday, 17 February 2020

आ साक़िया, मिला

ग़ज़ल

अपनी तरह का जब भी उन्हें माफ़िया मिला
बोले उछलके देखो कैसा काफ़िया मिला

फ़िर नस्ल-वर्ण-दल्ले हैं इंसान पे काबिज़
यूँ जंगली शहर में मुझे हाशिया मिला

मुझतक कब उनके शहर में आती थी ढंग से डाक
यां ख़बर तक न मिल सकी, वां डाकिया मिला

जब मेरे जामे-मय में मिलाया सभी ने ज़ह्र
तो तू भी पीछे क्यों रहे, आ साक़िया, मिला

मुझको जहाँ पे सच दिखा, हिम्मत दिखी, ग़ज़ब-
उनको वहीं पे फ़ोबिया.....सिज़ोफ्रीनिया मिला

उनको जहाँ पे सभ्यता औ’ संस्कृति दिखी
मुझको वहीं पैरेनॉइका...सीज़ोफ्रीनिया मिला

-संजय ग्रोवर

Friday, 16 August 2019

(Advertisement Idea by Sanjay Grover)

शूटिंग का दृश्य-
गाना बजता है-‘तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई......
लड़की लहराती हुई ज़ुल्फ़ों के साथ प्रवेश करती है-
डायरेक्टर-‘कट! कोई दूसरा गाना लगाओ-
दूसरा गाना बजाया जाता है-
‘उड़ी जो तेरी ज़ुल्फ़ें......
लड़की दोबारा अभिनय करती है।
डायरेक्टर-‘उंह, मज़ा नहीं आ रहा.....’
तीसरा गाना लगाया जाता है-
‘ज़ुल्फ़ लहराई तो.....
डायरेक्टर-‘ओफ़ªफ़ो! मज़ा क्यों नहीं आ रहा ? सब रुखा-रुखा क्यों लग रहा है ?’
सहायक-‘अरे! सर! बजाज आमंड्स् तेल तो लगाया ही नहीं!’
डायरेक्टर-‘हां यार! पहले तेल तो लगाओ, फ़िर कोई गाना गाओ.....’
और तेल लगे बालों के साथ अगले दृश्य में शूटिंग सफ़लतापूर्वक संपन्न होती है।
स्क्रीन पर पंक्तियां और आवाज़ उभरतीं हैं-
              बजाज आमंड्स् ड्रॉप्स्
तेल लगाओ, गाना गाओ
तेल लगाओ, गाना गाओ

-संजय ग्रोवर
(आज ही देखा, आज ही भेजा 17-08-2019)  

Monday, 12 August 2019

तेरे घर का पता-सा...


ग़ज़ल

कोई पत्ता हरा-सा ढूंढ लिया
तेरे घर का पता-सा ढूंढ लिया

जब भी रफ़्तार में ख़ुद को खोया
थोड़ा रुकके, ज़रा-सा ढूंढ लिया

उसमें दिन-रात उड़ता रहता हूं
जो ख़्याल आसमां-सा ढूंढ लिया

शहर में आके हमको ऐसा लगा
दश्त का रास्ता-सा ढूंढ लिया

तेरी आंखों में ख़ुदको खोया मगर
शख़्स इक लापता-सा ढूंढ लिया

पत्थरों की अजीब दुनिया ने
मुझमें इक आईना-सा ढूंढ लिया

उम्र-भर की ठगी-सी आंखों ने
बादलों में धुंआ-सा ढूंढ लिया

भीड़ के धोखे में आकर अकसर
बुत ने ख़ुदमें ख़ुदा-सा ढूंढ लिया

-संजय ग्रोवर

Tuesday, 16 April 2019

इक रोशन लम्हे की खातिर

ग़ज़ल


बाहर से ठहरा दिखता हूँ भीतर हरदम चलता हूँ
इक रोशन लम्हे की खातिर सदियों-सदियों जलता हूँ

आवाज़ों में ढूँढोगे तो मुझको कभी न पाओगे
सन्नाटे को सुन पाओ तो मैं हर घर में मिलता हूँ

दौरे-नफरत के साए में प्यार करें वो लोग भी हैं
जिनके बीच में जाकर लगता मैं आकाश से उतरा हूँ

कितने दिलों ने अपने आँसू मेरी आँख में डाल दिए
कोई आँसू ठहर न जाए यूँ मैं खुल कर रोता हूँ

-संजय ग्रोवर,

Thursday, 28 March 2019

जब मिलेगा, उसीसे पूछेंगे

ग़ज़ल

मेरी आवारग़ी को समझेंगे-
लोग जब ज़िंदग़ी को समझेंगे

गिरनेवालों पे मत हंसो लोगो
जो गिरेंगे वही तो संभलेंगे

ऐसी शोहरत तुम्हे मुबारक़ हो-
हमने कब तुमसे कहा! हम लेंगे!

जब भी हिम्मत की ज़रुरत होगी
एक कोने में जाके रो लेंगे 




क्यूं ख़ुदा सामने नहीं आता
जब मिलेगा, उसीसे पूछेंगे 

मर गए हम तो लोग रोएंगे
जीतेजी, पर, वो प्यार कब देंगे

तूने क्या-क्या न हमको दिखलाया
ऐ ख़ुदा! हम तुझे भी देखेंगे

वो अगर मौत से रहा डरता
लोग हर रोज़ उसको मारेंगे


-संजय ग्रोवर

(ख़ुदा =भगवान=god)

Monday, 18 February 2019

फिर आदमी बन जा

ग़ज़ल 

ज़िंदगी की जुस्तजू में ज़िंदगी बन जा
ढूंढ मत अब रोशनी, ख़ुद रोशनी बन जा

रोशनी में रोशनी का क्या सबब, ऐ दोस्त!
जब अंधेरी रात आए, चांदनी बन जा

गर तक़ल्लुफ़ झूठ हैं तो छोड़ दे इनको
मैंने ये थोड़ी कहा, बेहूदगी बन जा

हर तरफ़ चौराहों पे भटका हुआ इंसान-
उसको अपनी-सी लगे, तू वो गली बन जा

कुंओं में जीते हुए सदियां गई ऐ दोस्त
क़ैद से बाहर निकल, फिर आदमी बन जा

गर शराफ़त में नहीं पानी का कोई ढंग
बादलों की तर्ज़ पे आवारगी बन जा

-संजय ग्रोवर

Saturday, 2 February 2019

हमको बीमारी भली लगने लगी, ऐसा भी था


बह गया मैं भावनाओं में कोई ऐसा मिला
फिर महक आई हवाओं में कोई ऐसा मिला

हमको बीमारी भली लगने लगी, ऐसा भी था
दर्द मीठा-सा दवाओं में कोई ऐसा मिला

खो गए थे मेरे जो वो सारे सुर वापस मिले
एक सुर उसकी सदाओं में कोई ऐसा मिला

पाके खोना खोके पाना खेल जैसा हो गया
लुत्फ़ जीने की सज़ाओं में कोई ऐसा मिला

-संजय ग्रोवर

(एक पुरानी ग़ज़ल)



Thursday, 25 January 2018

यूं अनोखा-सा मोड़ देता हूं...

ग़ज़ल

ताज़गी-ए-क़लाम को अकसर
यूं अनोखा-सा मोड़ देता हूं
जब किसी दिल से बात करनी हो
अपनी आंखों पे छोड़ देता हूं


सिर्फ़ रहता नहीं सतह तक मैं
सदा गहराईयों में जाता हूं
जिनमें दीमक ने घर बनाया हो
वो जड़ें, जड़ से तोड़ देता हूं
08-07-1994


कैसी ख़ुश्क़ी रुखों पे छायी है
लोग भी हो गए बुतों जैसे
मैं भी, ज़िंदा लगूं, इसी ख़ातिर
सुख को चेहरे पे ओढ़ लेता हूं
23-04-1996

-संजय ग्रोवर

Friday, 14 July 2017

सबसे ख़ुले नेटवर्क पर एक बातचीत

हास्य-व्यंग्य

मैं एयरपूंछ से फलानी बोल रही हूं, संजय जी बोल रहे हैं ?

‘संजय जी तो यहां कोई नहीं है ! ....’

.......(तिन्न-मिन्न, कुतर-फुतर.....)

यहां तो संजय ग्रोवर है.....

(आजकल एक साइट भी, जो पहले संजय ग्रोवर के नाम से मेल भेजती थी, संजय जी के नाम से भेजने लगी है, लगता है ‘निराकार’ अपनी पोल ख़ुद ही खोलने पर उतारु है)

हां-हां, मैं माफ़ी चाहती हूं, उन्हीं से बात करनी थी... आपने एक नंबर डिस्कनेक्ट करवाने के लिए रिक्वेस्ट की थी...

मैंने तो दो के लिए की थी....

हां-हां, माफ़ी चाहती हूं....


आप क्यों डिस्कनेक्ट कराना चाहते हैं, समस्या क्या है ?

कोई एक वजह हो तो बताऊं, कई साल से झेल रहा हूं....

माफ़ी चाहती हूं, बहुत-बहुत माफ़ी चाहती हूं.......

इतनी माफ़ी मैं लाऊंगा कहां से, पूरे दिन ही कोई न कोई मांगता रहता है.....

आप क्यों हटवा रहे हैं, मैं सस्ता करवा दूंगी.....

पहले एक लड़की महंगा बेचती है, फिर दूसरी सस्ता कराती है.....आप पहले क्यों नहीं आईं.....

माफ़ी चाहतीं हूं......अभी तो यह कनेक्शन चल रहा है....

चल रहा होगा, मैंने अपनी तरफ़ से तो कटवा दिया......

अब क्या करना है...

मुझे क्या पता, डिस्कनेक्ट करने के बाद आप क्या करते हैं कनेक्शन का.....

पर यह कनेक्शन अभी चल रहा है...

परसों रात मैंने खाना मंगाने के लिए किया तब तो बता रहा था कट चुका है, अब चल रहा है ? मैं बिना खाने के सोया.....

पर यह तो चालू है....

यह तो बड़ा चालू है ! इतना चालू मुझे नहीं चाहिए, मैं अकेला आदमी, यहां चारों तरफ़ चा....

आपसे रात को किसने कहा कि कट गया है ?

मुझे क्या मालूम, रिकॉर्डिंग होगी, आपके ओनर को पता होगा किसको ठेका देते हैं.....मैं क्या यहां पर सबके फ़ोटो लगाए बैठा हूं.....फ़ोन में क्या दिखाई देता है...

यहां पर लिखा आ रहा है चालू....

मैं क्या करुं, मुझे क्या यहां से दिख रहा है...आपने ही लिख लिया होगा, आपका क़ाग़ज़, आपका पैन, मुझे तो यह भी नहीं पता आपका दफ़्तर कहां है....

मैं आपको 499 का प्लान करवा दूंगी....

पहले तो आपने ही यहां गत्ता लगा रखा है कि 899 से कम कुछ है ही नहीं.....

पर मैं करा सकती हूं....

आप करा सकतीं हैं तो दूसरी क्यों नहीं करा सकती थी ? आप लोगों का आपस में भी लफ़ड़ा है ?

नहीं-नहीं...

फिर आप ही क्यों नहीं इंचार्ज बन जातीं....आप कहें तो मैं आपके लिए......

मैं बहुत सस्ता करा दूंगी 

मुझे नहीं चाहिए सस्ती चीज़ें, यहां सब सस्ता है-सस्ती बातें सस्ती हरक़तें....

अब क्या करना है ? इतना महंगा क्यों चला रहे हैं...

मैंने कटवा के दूसरा ले लिया, आपके यहां से ही लिया है, आपको पता ही नहीं है, आप लोगों का आपस में कोई तालमेल ही नहीं है....

इसको लगवा लीजिए, इसमें....

अब हटवा दिया.....गीता में लिखा है जो हुआ अच्छा हुआ....

यह आपने बहुत अच्छी बात कही सर....

यह मैंने नहीं कही, गीता में से निकाली है....यहां के नये लोगों को भी पुरानी बातें जल्दी समझ में आती हैं इसलिए.....

हिच हिच हिच अब क्या करना है सर...हिच हिच हिच डिस्कनेक्ट करना है...हिच हिच हिच...........

सौ परसेंट करना है.....

हिच हिच हिच....एयरपूंछ में समय देने के लिए धन्यवाद...हिच हिच हिच....

समय लेने के लिए थैंक्यू.....

(एक ख़ुले नेटवर्क पर अभी कुछ देर पहले हुई थोड़ी-सी ख़ुली बातचीत, स्मृति के आधर पर कुछ अंश)

-संजय ग्रोवर
14-07-2017

Thursday, 26 January 2017

अमेज़न, हिंदी, क़िताब-ब्लॉक, विवाद और मैं

पिछला भाग

पहली क़िताब मैंने पोथी डॉट कॉम पर छापी। छापी क्या वह तो ट्राई करते-करते में ही छप गई। सोचा कि यार देखें तो सही, क्या पता छप ही जाए। काफ़ी मग़जमारी करनी पड़ी पर अंततः क़िताब तो छप गई। काफ़ी कुछ सीखने को मिला पर उससे कहीं ज़्यादा अभी सीखने को बचा हुआ था। ऐसी ही कई चीज़ों से ग़ुज़रते हुए यह और अच्छी तरह से समझ में आया कि ‘परफ़ैक्ट मैन’ या ‘संपूर्ण ज्ञान’ जैसी धारणाएं कितनी हास्यास्पद है।
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उसके बाद क़ाफ़ी टाइम निकल गया। बीच-बीच में अमेज़ॉन, गूगल और अन्य ऑनलाइन पब्लिशर्स की साइट्स् पर जा-जाकर समझने की कोशिश करता रहा। अमेज़ॉन पर जाकर एक चीज़ समझ में नहीं आती थी कि वहां हिंदी क़िताबें/ईक़िताबें तो काफ़ी दिखाई देतीं थीं मगर जब मैं क़िताब छापने की प्रकिया में आगे चलता था तो वहां हिंदी में छापने का ऑप्शन कहीं दिखाई नहीं देता था। मैं बार-बार मन मार लौट आता।

फिर एक दिन गूगल प्ले पर लगा कि यहां हिंदी में छापी जा सकती है, मैंने सोचा कि क्या अमेज़ान के लिए बैठे रहेंगे, गूगल का नेटवर्क अच्छा-ख़ासा है और जैसी कि मेरी आदत है कि नयी या अलग चीज़ शुरु करने में ज़्यादा घबराता नहीं हूं, शुरु कर ही देता हूं सो गूगल प्ले को समझने में लग गया। कई दिन लगे, बार-बार कोई न कोई समस्या आ जाती थी और निराशा हाथ लगती थी मगर कुछ दिन बाद फिर शुरु हो जाता था। और अंततः वहां भी, थोड़ी कमी-बेशी के साथ ही सही, क़िताब छप ही गई। बाद में उसे सुधारता रहा, अभी तक भी ठीक करता रहता हूं। गूगल प्ले पर मुझे एक बात यह भी अच्छी लगी कि अगर आपकी तरफ़ से कोई तक़नीक़ी कमी न हो तो क़िताब तुरंत ही पब्लिश/लाइव हो जाती है जबकि अमेज़ॉन क़िताब अप्रूव करने के लिए 24 से 72 घंटे लेता है। गूगल पर एक और अच्छी बात यह है आप क़िताब की क़ीमत कम से कम कितनी भी रख सकते हैं जबकि अमेज़ॉन पर यह तीन(2.99) डॉलर से कम नहीं हो पा रही थी। बाद में पता चला कि पुस्तक-प्रमोशन की कुछ योजनाओं के तहत या दूसरी साइट्स् से प्रतिस्पर्द्धात्मक तुलना के तहत क़ीमत कम भी हो सकती है पर वह सारा काम अमेज़ॉन-प्रबंध ही करता है, यह हमारे हाथ में नहीं है। । बहरहाल गूगल पर दो क़िताबें छाप डाली, और देखा कि बिक भी रहीं हैं तो थोड़ा उत्साह बढ़ा।
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तब सोचा कि अमेज़ॉन पर फिर से ट्राई मारी जाए, आखि़र दूसरे लोग हिंदी में छाप भी रहे हैं और बाक़ायदा पब्लिसिटी भी कर रहे हैं। यह मुझे पता ही था कि अमेज़ॉन बिना अप्रूवल के क़िताब नहीं छापता, 24 से 72 घंटे लेता है, सोचा कि छाप के देखते हैं, अगर कोशिश ग़लत होगी तो अमेज़ान अप्रूव ही नहीं करेगा। पहले ‘ऐसा भी होता है’ नाम का एक पुराना हस्तलिखित बाल जासूसी उपन्यास निकाला। कई दिन, कई घंटे दिमाग़ मारा, आखि़रकार अप्रूव भी हो गया और छप भी गया। फिर सोचा कि कविता-संग्रह कभी नहीं छापा, क्यों न अमेज़ॉन पर ट्राई किया जाए। तक़नीक़ी और दोहराव के कामों में बहुत बोरियत आती है मगर लगा रहा, और देखा कि कविता-संग्रह भी अप्रूव होकर छप गया।
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अमेज़ॉन का पुस्तक-प्रकाशन के क्षेत्र में जैसा नाम है, मैं चाहता तो मैं भी उसका फ़ायदा उठाते हुए ख़ुदको महान, सफ़ल, भगवान ;-) की तरह पेश कर सकता था (जैसाकि अकसर दूसरों को करते देखा है)मगर मैंने बहुत सादा ढंग से ही कविता संग्रह को पेश किया। बताया कि यहां से कोई भी छाप सकता है, कोई बड़ी बात नहीं है, हालांकि मैं जानता था कि कई लोग जो ऐसे ही कुछ ‘राज़’/‘रहस्य’ वग़ैरह छुपाकर महान और भगवान टाइप बने रहते हैं, मेरे ऐसे प्रयत्न पर बुरा भी मान सकते हैं। लेकिन मैं भी क्या करुं, मेरी भी तो ज़िंदगी, सच्चाई, समझदारी और ईमानदारी को लेकर अपनी एक सोच है ?

फिर एक दिन अचानक अमेज़ॉन से मेल आया कि आपकी क़िताब हमने रोक दी है क्योंकि हमारे यहां हिंदी समर्थित भाषा नहीं है।

कुछ और दिन बाद उन्होंने क़िताब ब्लॉक करदी। उसके बाद उनका और मेरा बज़रिए ईमेल जो भी पत्र-व्यवहार हुआ, ज्यों का त्यों आपके सामने रख रहा हूं-

(जारी)

-संजय ग्रोवर
26-01-2017

(उक्त जानकारी की पूर्ण-सत्यता का लेखक का कोई दावा नहीं हैं, दुनिया/चीज़ें रोज़ाना तेज़ी से बदल रहीं हैं)

Friday, 6 January 2017

ईबुक EBOOK

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फ़ायदे-                                                                 

1.    इसमें कोई ख़र्चा नहीं आता, कई साइटें यह सुविधा मुफ़्त में देतीं हैं। बस आपमें इससे संबंधित थोड़ी-सी तक़नीक़ी योग्यता होनी चाहिए।
 

2.    इन्हें छापने के लिए कोई जोड़-जुगाड़, तिकड़म, सिफ़ारिश, जान-पहचान, रिश्तेदारी, अहसान आदि कुछ भी नहीं चाहिए, साइट पर जाईए और शुरु हो जाईए। बस, आपके पास कहने या बताने के लिए कुछ होना चाहिए।
 

3.    इन्हें कहीं भी आसानी से पढ़ा जा सकता है, कोई भी ईबुक रीडर, मोबाइल, स्मार्टफ़ोन, टेबलेट, लैपटॉप, डेस्कटॉप आदि इनके लिए काफ़ी हैं।
 

4.    इनसे संबंधित संदर्भ/जानकारियां लेखक और पाठक दोनों को, अकसर इंटरनेट पर ही लिंक के रुप में मिल जाते हैं, पुस्तकालय व अन्य संस्थाओं में भागना नहीं पढ़ता।
 

5.    तयशुदा रॉयल्टी के पैसे पुस्तक बिकने के बाद संबंधित साइट पर बने आपके एकाउंट में प्रदर्शित होने लगते हैं।
 

6.    ज़्यादातर साइटें आपकी क़िताब का लगभग बीस प्रतिशत हिस्सा ग्राहकों के सामने नमूने/सैम्पल की तरह पेश करतीं हैं। उसे पढ़ने के बाद अगर पाठक को पुस्तक अच्छी लगती है तभी वह पुस्तक ख़रीदता है। इसलिए भूमिका, प्राक्कथन, ब्लर्ब आदि इनमें ज़रुरी नहीं हैं ; इस हाथ दे, उस हाथ ले जैसा मामला है।
 

7.    इन्हें कभी भी एडिट/संशोधित किया जा सकता है, नया जोड़ा जा सकता है, पुराना हटाया जा सकता है।
 

8.    अगर जानकारी हो तो इनके कवर आदि आप ख़ुद ही बना सकते हैं और अपनी क्रिएटिविटी को नये-नये आयाम दे सकते हैं।
 

9.    कुछ साइटों पर ये तुरंत ही पब्लिश हो जातीं हैं तो कुछ साइटें इसके लिए 24 से 72 घंटे का समय लेतीं हैं।
 

10.    यहां किसी क़िस्म की सेंसरशिप नहीं है, जैसा आप लिखते हैं, वैसा ही पाठकों तक पहुंचता है।
 

11.    दुनिया-भर के लेखकों की मशहूर या नई क़िताबें आप घर बैठे ख़रीद सकते हैं। समझिए कि दुनिया-भर के बुक स्टॉल, पुस्तकालय और पुस्तक मेले, लैपटॉप या मोबाइल की शक़्ल में आपकी गोद या जेब में आ गए हैं।
 

12.    इनके साइज़, फाँट, टैक्स्ट आदि को चाहे जैसे ऐडजस्ट किया जा सकता है, संबंधित साइटें इसके लिए कई सुविधाएं/ऐप्स् आदि देतीं हैं।
 

13.    इनमें कीड़े नहीं लगते, ये कभी फटतीं नहीं हैं, इनपर धूल नहीं जमती।
 

14.    इन्हें रखने के लिए बड़ी-बड़ी अलमारियां, रैक, शेल्फ़ और पुस्तकालय नहीं चाहिएं, बस छोटी-सी पेन ड्राइव, कोई भी ईबुक रीडर, मोबाइल, स्मार्टफ़ोन, टेबलेट, लैपटॉप, डेस्कटॉप, ऐक्सटर्नल ड्राइव, सीडी आदि काफ़ी हैं।
 

15.    अपने देश के लोगों की क्रयशक्ति और रुचियों को देखते हुए आप इनकी क़ीमतें जेनुइन रख सकते हैं। इनमें मेहनत ज़रुर काफ़ी लगती है पर कंप्यूटर और इंटरनेट के अलावा अन्य ख़र्चा नहीं आता।

आईए, दुनिया को साफ़-सुथरा, स्पष्ट और ज़्यादा से ज़्यादा पारदर्शी बनाएं।

ईबुक तक़नीक़ का मैं विशेषज्ञ तो नहीं हूं मगर जितना मुझे आता है उतना अगले अंकों में बताने की कोशिश करुंगा-

         


       (जारी)

-संजय ग्रोवर
06-01-2017
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(उक्त जानकारी की पूर्ण-सत्यता का लेखक का कोई दावा नहीं हैं, दुनिया/चीज़ें रोज़ाना तेज़ी से बदल रहीं हैं)


Friday, 11 November 2016

तर्क, आत्मविश्वास, सवाल, प्लैजियरिज़्म और ईमानदारी

इस ब्लॉग पर जो मैं शुरु करना चाहता था उसकी यह पहली कड़ी है।

पिछले छः-सात सालों से, भारत में संभवतम स्वतंत्रता, ईमानदारी और आनंद के साथ जी रहा हूं। सच्चाई, ईमानदारी और मौलिकता का अपना आनंद है। मेरी सारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी मासिक धनराशि 10 से 13-14 हज़ार रु. में मैं यह कर पा रहा हूं। बीच में तरह-तरह के संकट आए, कुछ संकटों और समाधानों के बारे में फ़िलहाल मेरे अलावा किसीको भी नहीं पता। उनका ज़िक़्र भी कहीं न कहीं आएगा। यहां यह बताना है कि सच्चाई, ईमानदारी और मौलिकता अपना ही मज़ा है। स्पष्ट कर दूं कि इसमें किसी व्यक्ति-विशेष, व्यवस्था-विशेष, सिद्धांत-विशेष, विचारधारा-दल-वाद-विशेष का हाथ नहीं है, अपनी तरह से जीने के लिए रास्ते भी ख़ुद ही निकालने पड़ते हैं।

मेरी उम्र 53 से ऊपर हो चुकी है और पिछले 2-3 सालों से कभी-कभार मैं नौकरी के लिए एप्लाई कर देता हूं। हालांकि कोई ख़ास दिक़्क़त नहीं है इसलिए कोई जल्दी भी नहीं है।

कल ही मुझे एक कंपनी/नियोक्ता का जवाब मिला। पार्ट-टाइम और होम-बेस्ड जॉब के लिए एक फ़ॉर्म भरकर वापिस भेजना था। उन्होंने कहा कि कुछ पूछना हो तो पूछ सकते हैं। मैंने निम्नलिखित बातें पूछ लीं-






प्रिय मित्र,

फ़ॉर्म भरकर भेजने से पहले कुछ बातें जानना आवश्यक हैं-

1.    आपको किन विषयों और विधाओं(Themes and genres) में लेख चाहिए ?
2.    क्या इन लेखों के साथ मूल लेखक का नाम जाएगा या इनके साथ आपकी एजेंसी/कंपनी/संस्था का नाम जागा ?
3.    नेफ़्ट(NEFT) से क्या तात्पर्य है ?
4.    ‘आर्टीकिल मस्ट बी डिलीवरिंग विदिन 24 आवर्स आफ़्टर असाइनिंग’(Article must be delivering within 24 hrs after assigning) का स्पष्ट मतलब क्या है-पहली बार जॉइन करने के 24 घंटे में या किसी विषय-विशेष पर आपकी या अन्य किसी (क्लाइंट/कस्टमर/मेंबर आदि) की मांग के 24 घंटे के अंदर ?
5.    यू आई डी नं. क्या है ?
6.    मुझे अपना ब्लड-ग्रुप नहीं पता! कभी ज़रुरत ही नहीं पड़ी।
7.    प्लेजियरिज़्म चैकर कौन मुहैया कराएगा ? आप कराएंगे या ख़ुद ही इसका प्रबंध करना होगा ? यह कहां से मिलेगा ?
8.    कीवर्ड डेंसिटी 1-3 प्रतिशत से क्या तात्पर्य है ?
9.    ‘इफ़ कंपनी फ़ाउंड स्पिन ऑर रीराइट्स् कंटेंट दैन यू/योर पेमेंट विल बी ब्लॉक्ड् बाइ कंपनी’ से क्या तात्पर्य है(If company found spin or rewrites Content then you/your payment will be blocked by company.) ? क्या मात्रा या व्याकरण की मामूली ग़लतियां जो आमतौर पर बड़ा काम करते हुए एकाध हो ही जातीं हैं, ठीक करने को रीराइट करना माना जाएगा ? मेरी समझ में रीराइट करना ठीक नहीं है, आर्टीकल लौटा देना बेहतर है वरना मूल विचार, मूल लेखक को कुछ नहीं मिलेगा और रीराइट करनेवाला मुफ़्त में, ज़रा-सा रीराइट करके, पूरा लाभ उठाएगा। मेरी समझ में यह भी स्पिन/प्लैजियरिज़्म ही है।
कृपया स्पष्ट करें-

शुभकामनाओं सहित,

-संजय ग्रोवर
11-11-2016





-संजय ग्रोवर
11-11-2016

Friday, 7 October 2016

खामख़्वाह सीधा रास्ता देखा......

पैरोडी



तेरी आंखों में हमने क्या देखा
डर गए, ऐसा माफ़िया देखा


हमने इतिहास जाके क्या देखा
काम कम, नाम ही ज़्यादा देखा


अपनी तहज़ीब तो थी पिछली गली
खामख़्वाह सीधा रास्ता देखा


अपने पैसे लगे चुराए से
ख़ुदपे आयकर को जब छपा देखा


हाय! अंदाज़ तेरे बिकने का
तू ही दूसरों को डांटता देखा


भूले गिरगिट के रंग बदलने को
पंद्रह मिनटों में क्या से क्या देखा 


फिर न आया ख़्याल तोतों का
जबसे स्कूल/मंदिर का रास्ता देखा


-संजय ग्रोवर
(क्षमा महान है/शायर और भी महान है)
07-10-2016

Wednesday, 5 October 2016

फ़िल्मी

लघुकथा



बहुत-से लोग चाहते हैं कि उनपर कोई फ़िल्म बनाए।

हालांकि उनमें से कईयों की ज़िंदगी पहले से ही फ़िल्म जैसी होती है।

उनके द्वारा छोड़ दिए गए सारे अधूरे कामों को फ़िल्मों में पूरा कर दिया जाता है।

किसीने कहा भी है कि ज़िंदगी में किसी समस्या से निपटने से आसान है फ़िल्म में उसका ख़ात्मा कर देना।

किसीने क्या, मैंने ही कहा है।



-संजय ग्रोवर

05-10-2016


Tuesday, 22 March 2016

कि ये जो लोग हैं, ये हैं ही ऐसे...

ग़ज़ल

हुआ क्या है, हुआ कुछ भी नहीं है
नया क्या है, नया कुछ भी नहीं है

अदाकारी ही उनकी ज़िंदगी है
जिया क्या है, जिया कुछ भी नहीं है

रवायत चढ़के बैठी है मग़ज़ में
पिया क्या है, पिया कुछ भी नहीं है

लिया है जन्म जबसे, ले रहे हैं
दिया क्या है, दिया कुछ भी नहीं है

कि ये जो लोग हैं, ये हैं ही ऐसे
किया क्या है, किया कुछ भी नहीं है

-संजय ग्रोवर
22-03-2016


Saturday, 30 January 2016

पार्टनरशिप

लघुव्यंग्यकथा

सड़क-किनारे एक दबंग-सा दिखता आदमी एक कमज़ोर-से लगते आदमी को सरे-आम पीट रहा था। पिटता हुआ आदमी ‘बचाओ-बचाओ’ चिल्ला रहा था। लोग बेपरवाह अपने रुटीन के काम करते गुज़र रहे थे। 

‘हाय! हमें बचाने कोई नहीं आता, कोई हमारा साथ नहीं देता.....’, वह कराह रहा था...

एक आदमी रुका, ‘क्यों भई, बात क्या है ? क्यों पीट रहे हो उसे !? क्या बिगाड़ा है उसने तुम्हारा ?’

दबंग अभी कुछ जवाब देता कि पिटनेवाला एकदम उठकर खड़ा हो गया, कड़क कर बोला, ‘किसने तुम्हे बुलाया ? शर्म नहीं आती, फूट डालने की कोशिश कर रहे हो हम दोनों में !’

ज़ाहिर है कि बीच में पड़नेवाला आदमी सकपका गया, ऐसी तो उसने कल्पना तक न की थी।

ख़ुदको छला गया महसूस करते हुए वह भारी मन और भारी क़दमों से घर लौटा।

अब जब कभी वह राह चलते ऐसे दृश्य देखता है, कोई पुकार सुनता है तो उसे कोई रियाज़, रुटीन या रिहर्सल मानते हुए आगे बढ़ जाता है।

-संजय ग्रोवर
30-01-2016

Wednesday, 30 December 2015

हिंदू या मुसलमान होना भी कोई होना है

कुछ रचनाएं आप शुरुआती दौर में, कभी दूसरों के प्रभाव या दबाव में तो कभी बस यूंही, लिख डालते हैं और भूल जाते हैं, मगर गानेवालों और सुननेवालों को वही पसंद आ जातीं हैं...... 




ग़ज़ल

आज मुझे ज़ार-ज़ार आंख-आंख रोना है
सदियों से गलियों में जमा लहू धोना है 

रिश्तों के मोती सब बिखर गए दूर-दूर
प्यार का तार कोई इनमें पिरोना है

इंसां बनके आए थे, इंसां बनके जाएंगे
हिंदू या मुसलमान होना भी कोई होना है

प्यार बनके जब चाहो मेरे घर चले आओ
आंखों में आंगन है दिल मेरा बिछौना है

माना तू हक़ीकत है और ख़ूबसूरत है
मेरे ख़्वाबोंवाला मुखड़ा भी सलोना है
 

-संजय ग्रोवर



Friday, 25 December 2015

डूबता हूं न पार उतरता हूं

बहुत पुरानी एक ग़ज़ल



















डूबता हूं न पार उतरता हूं
आप पर एतबार करता हूं

ग़ैर की बेरुख़ी क़बूल मुझे
दोस्तों की दया से डरता हूं

जब भी लगती है ज़िंदगी बेरंग
यूंही ग़ज़लों में रंग भरता हूं

अपना ही सामना नहीं होता
जब भी ख़ुदसे सवाल करता हूं

करके सब जोड़-भाग वो बोला
मैं तो बस तुमसे प्यार करता हूं

-संजय ग्रोवर

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