Tuesday, 16 April 2019

इक रोशन लम्हे की खातिर

ग़ज़ल


बाहर से ठहरा दिखता हूँ भीतर हरदम चलता हूँ
इक रोशन लम्हे की खातिर सदियों-सदियों जलता हूँ

आवाज़ों में ढूँढोगे तो मुझको कभी न पाओगे
सन्नाटे को सुन पाओ तो मैं हर घर में मिलता हूँ

दौरे-नफरत के साए में प्यार करें वो लोग भी हैं
जिनके बीच में जाकर लगता मैं आकाश से उतरा हूँ

कितने दिलों ने अपने आँसू मेरी आँख में डाल दिए
कोई आँसू ठहर न जाए यूँ मैं खुल कर रोता हूँ

-संजय ग्रोवर,

Thursday, 28 March 2019

जब मिलेगा, उसीसे पूछेंगे

ग़ज़ल

मेरी आवारग़ी को समझेंगे-
लोग जब ज़िंदग़ी को समझेंगे

गिरनेवालों पे मत हंसो लोगो
जो गिरेंगे वही तो संभलेंगे

ऐसी शोहरत तुम्हे मुबारक़ हो-
हमने कब तुमसे कहा! हम लेंगे!

जब भी हिम्मत की ज़रुरत होगी
एक कोने में जाके रो लेंगे 




क्यूं ख़ुदा सामने नहीं आता
जब मिलेगा, उसीसे पूछेंगे 

मर गए हम तो लोग रोएंगे
जीतेजी, पर, वो प्यार कब देंगे

तूने क्या-क्या न हमको दिखलाया
ऐ ख़ुदा! हम तुझे भी देखेंगे

वो अगर मौत से रहा डरता
लोग हर रोज़ उसको मारेंगे


-संजय ग्रोवर

(ख़ुदा =भगवान=god)

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