Monday, 17 February 2020

आ साक़िया, मिला

ग़ज़ल

अपनी तरह का जब भी उन्हें माफ़िया मिला
बोले उछलके देखो कैसा काफ़िया मिला

फ़िर नस्ल-वर्ण-दल्ले हैं इंसान पे काबिज़
यूँ जंगली शहर में मुझे हाशिया मिला

मुझतक कब उनके शहर में आती थी ढंग से डाक
यां ख़बर तक न मिल सकी, वां डाकिया मिला

जब मेरे जामे-मय में मिलाया सभी ने ज़ह्र
तो तू भी पीछे क्यों रहे, आ साक़िया, मिला

मुझको जहाँ पे सच दिखा, हिम्मत दिखी, ग़ज़ब-
उनको वहीं पे फ़ोबिया.....सिज़ोफ्रीनिया मिला

उनको जहाँ पे सभ्यता औ’ संस्कृति दिखी
मुझको वहीं पैरेनॉइका...सीज़ोफ्रीनिया मिला

-संजय ग्रोवर

Friday, 16 August 2019

(Advertisement Idea by Sanjay Grover)

शूटिंग का दृश्य-
गाना बजता है-‘तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई......
लड़की लहराती हुई ज़ुल्फ़ों के साथ प्रवेश करती है-
डायरेक्टर-‘कट! कोई दूसरा गाना लगाओ-
दूसरा गाना बजाया जाता है-
‘उड़ी जो तेरी ज़ुल्फ़ें......
लड़की दोबारा अभिनय करती है।
डायरेक्टर-‘उंह, मज़ा नहीं आ रहा.....’
तीसरा गाना लगाया जाता है-
‘ज़ुल्फ़ लहराई तो.....
डायरेक्टर-‘ओफ़ªफ़ो! मज़ा क्यों नहीं आ रहा ? सब रुखा-रुखा क्यों लग रहा है ?’
सहायक-‘अरे! सर! बजाज आमंड्स् तेल तो लगाया ही नहीं!’
डायरेक्टर-‘हां यार! पहले तेल तो लगाओ, फ़िर कोई गाना गाओ.....’
और तेल लगे बालों के साथ अगले दृश्य में शूटिंग सफ़लतापूर्वक संपन्न होती है।
स्क्रीन पर पंक्तियां और आवाज़ उभरतीं हैं-
              बजाज आमंड्स् ड्रॉप्स्
तेल लगाओ, गाना गाओ
तेल लगाओ, गाना गाओ

-संजय ग्रोवर
(आज ही देखा, आज ही भेजा 17-08-2019)  

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