Monday, 6 July 2015

अबे! तुम लोद तिस तत्तर में हो आदतल ?

हल्का-फ़ुल्का


दब्बर सिंद: त्यों बे तालिया! त्या थोत तर आए ते ? ति थरदार भहुत थुत होदा.......

तालिया: एक मिनट सरदार, एक मिनट! आप क्या विदेश-यात्रा से लौटे हैं !?

दब्बर: अबे त्या बत रहा ए, महीना हो दया झामपुर थे बाहर नितले!

तालिया: तो फिर ‘सोचकर आए थे’ ‘सोचकर आए थे’ क्या लगा रखी है ? यहां के लेखक-चिंतक भी बिना-सोचे-विचारे कुछ भी लिखते रहते हैं, और आप डाकुओं को सुचवाने पर तुले हैं ? अगली डकैतियां सब फ्लॉप करवानी हैं क्या ?

दब्बर: थीत है, थांबा, तितना दोली हैं इतते अंदर ?

थांबा: बताता हूं सरदार, प्लीज़ थोड़ा टाइम दीजिए....

थरदार: अबे, दरा-थी दोलियां दिनने में तितना ताइम लदाएदा ?

थांबा: सरदार, हमारे शायर सालों से लगे हैं, दो मिसरों की मात्रा बराबर नहीं गिन पा रहे और आप चाहते हो एक मिनट में गोलियां बता दूं ?

सरदार: अबे! तुम लोद तिस तत्तर में हो आदतल ? तहीं पुरस्तार-वुरस्तार लूतने ते तत्तर में तो नहीं हो ? यहां तबाड़ा पैले ता नहीं निपत पा रहा और तुम....

तालिया-थांबा: नहीं-नहीं, सरदार, हम बिलकुल ठीक-ठाक हैं, चिंता की कोई बात नही, बस ज़रा टाइम पास कर रहे थे..... 

सरदार: थुतर है, थुतर है, अबे तुमने तो मुधे दरा ही दिया ता।


-थंदय द्रोवर
06-07-2015


-संजय ग्रोवर


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